उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों की अध्ययन आदत एवं शैक्षिक उपलब्धि पर एक अध्ययन
डॉ. कमल नारायण गजपाल1, सुमिला दीपा तिर्की2
1विभागाध्यक्ष, प्रगति महाविद्यालय, रायपुर.
2एम.एड. छात्रा, प्रगति महाविद्यालय, रायपुर.
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
शिक्षा वह प्रकाष हैं जिसके द्वारा बालक की समस्त शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों का विकास होता हैं। इससे वह समाज का एक उत्तरदायी घटक एवं राष्ट्र का प्रखर चरित्र संपन्न नागरिक बनकर समाज की सर्वांगिण उन्नति में आनी शक्ति का उत्तरोत्तर प्रयोग करने की भावना से ओत-प्रोत होकर संस्कृति तथा सभ्यता को पुर्नजीवित एवं पुर्नस्थापित करने के लिए प्रेरित हो जाता हैं।
KEYWORDS: उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, विद्यार्थी, अध्ययन आदत, शैक्षिक उपलब्धि।
प्रस्तावना –
षिक्षा व्यक्ति की संपूर्णता का परिमाप हैं यह व्यक्ति के चरित्र को उत्कृष्ट बनाती हैं। षिक्षा से ही व्यक्ति का चरित्र प्रखर बनता हैं। षिक्षा से ही व्यक्ति को सही रूप में देखा जाता हैं। षिक्षा से ही व्यक्ति सही रूप में चिंतन करना सीखता हैं। मानव षिक्षा के बगैर संपूर्णता की प्राप्ति नहीं कर सकता हैं। षिक्षा संपूर्ण रूप में षिक्षार्थी एक पहुॅंच इस हेतु षिक्षण का सही दिषा में क्रियान्वन होना आवष्यक हैं।
इस प्रकार षिक्षा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया हैं। बालक प्रारंभ में माता-पिता व अन्य सदस्यों से सीखता हैं। घर से बाहर निकलने के पश्चात् वह विद्यालय खेल के मैदान तथा पड़ोस से नवीन अनुभव प्राप्त करने का परिणाम यह होता हैं, कि वह अपने वातावरण तथा जीवन में आने वाली नवीन परिस्थितियों से समायोजन करना सीख जाता हैं। इस प्रकार से षिक्षा का क्षेत्र व्यापक हैं।
आदत:-
आदत व्यक्ति का एक विषेष गुण हैं जो प्रत्येक बालक में जन्म से ही होता हैं। कुछ आदतें उनमें जन्म से होती हैं तथा कुछ आदतें परिवार, स्कूल तथा खेल आदि से उनमें विकसित की जाती हैं। कुछ आदतें उम्र के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं, लेकिन यदि परिवार के द्वारा बालकों पर सही समय पर सही ध्यान दिया जाए तो परिवर्तित होने वाली आदतों को सकारात्मक रूप दिया जा सकता हैं, जिसका प्रभाव षिक्षा की उपलब्धियों पर भी निष्चित रूप से सकारात्मक ही होगा।
आदत का अर्थः-
जन्म से ही व्यक्ति अपने वातावरण से कुछ न कुछ सीखता रहता हैं। उसकी बहुत सी सीखी हुई क्रिया बार-बार एक ही रूप में घटित होने के कारण स्थायी आचरण का रूप धारण कर लेती हैं। इन्हीं स्थायी आचरणों को आदत कहा जाता हैं। आदतों को मनुष्य में सीखे हुए व्यवहारों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता हैं। जिस कार्य को हम बार-बार करते हैं वे ही हमारी आदत बन जाती हैं।
आदत की परिभाषा:-
गिलिलेण्ड के अनुसार - ‘‘आदत वह अर्जित अनुभव हैं जो व्यवहार परिवर्तन से आती हैं, अधिगम की प्रक्रिया से यह परिवर्तन आते हैं।‘‘
आदत के प्रकार:- ‘‘सामान्यतः आदतें दो प्रकार की होती हैं। अच्छी तथा बुरी आदतें। अच्छी तथा बुरी आदत में से कुछ आदतें जीवनोपयोगी होती हैं कुछ दुसरों के द्वारा आती हैं, इसलिए आदतों को तीन प्रकार से विभाजित किया जाता हैं -
1. स्वकीय एवं परकीय आदत:-
जो आदत बालक स्वयं डालते हैं। स्वकीय होती हैं, जैसे - चलना, उठना, बैठना आदि। जो आदत कहलाती हैं, परन्तु यदि माता-पिता एवं षिक्षक ध्यान न देें तो बालकों में लिखने-पढने, चलने, बड़े होने के दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त पढ़ने से संबंधित दोष उत्पन्न होने लगते हैं, जैसे - लेटकर पढ़ना, पास से पढ़ना, एक ही विषय अधिक पढ़ना, कठिन विषयों को न पढ़ना, गृह कार्य न करना। परन्तु उन्हें उचित देख-रेख में रखने से बालकों में अच्छी आदतें विकसित होती हैं।
2. सहज एवं शैक्षणिक आदत:-
जिन आदतों या व्यवहारों को षिक्षा के माध्यम से प्राप्त करते हैं शैक्षणिक आदत कहलाती हैं।
आदत की षिक्षा में उपयोगिताः-
1. बालक के विकास के भिन्न-भिन्न स्तरों पर भिन्न-भिन्न प्रकार के रूचियां एवं आदतें पायी जाती हैं। इसके लिए बालकों की आदत से अच्छी तरह परिचित होना चाहिए तथा बालक मस्तिष्क के अनुकुल भी कार्य का प्रबंध करना चाहिए।
2. किसी भी विषय में बालकों की आदतों में वृद्धि तथा परिवर्तन करने के लिए आवष्यक हैं, कि जो विषय बालकों को पढ़ाया वह न अधिक आसान हो न अधिक कठिन हो।
3. बालक प्रायः उन वस्तुओं में अधिक रूचि नहीं रखते जो उनकी आदतों के विपरीत हो । इसलिए पढ़ाते समय उद्देष्य को सदैव बालकों के समक्ष स्पष्ट करना चाहिए।?
बालक और आदत:-
बाल्य अवस्था से ही आदत डालने का समय हैं। जिन आदतों के अंकुरण बाल्यावस्था में उत्पन्न हो जाते हैं, वे मनुष्य में जीवनपर्यन्त बने रहते हैं। बालक में अच्छी आदत होने पर उसका मानव जीवन सफल होगा अन्यथा बुरी आदत होने पर उसका जीवन कष्टों से भरपूर होगा।
अतः माता-पिता, अभिभावक, षिक्षक सभी का यह कार्य हैं, कि वे बालको में अच्छी आदतें उत्पन्न करने का प्रयास करें तथा साथ ही यह भी ध्यान करना चाहिए कि बालक अपने आदतों का गुलाम न बन जाये। आदतों का स्वामी बनना ही सुखकर होता हैं।
आदत और षिक्षा:-
षिक्षा का अर्थ हैं, विकास से संबध्द आदतों का ही मानव विकास में एक महत्वपूर्ण स्थान हैं। षिक्षा व्यक्ति को विकास द्वारा सामाजिक जीवन को सुखी तथा समृद्धिषाली बनाने का प्रयास करती हैं। इसके लिए बालकों में अच्छी आदतों का विकास करना चाहिए। क्योंकि बालकों में अच्छे व बुरे की पहचान नही के बराबर होती हैं।
बालकों के शैक्षिक उपलब्धि:-
शैक्षिक उपलब्धि से आश्रय षिक्षा के क्षेत्र में प्राप्त परिणामों से होता हैं। शैक्षिक उपलब्धि विद्यार्थियों द्वारा किये जाने वाले कक्षा कक्षों की क्रिया होती हैं। जो विद्यार्थी द्वारा पूरे सत्र में अधिगम की जाती हैं। शैक्षिक उपलब्धि को कक्षा कक्ष का वातावरण, पारिवारिक, आर्थिक स्तर, धार्मिक स्थिति, पारिवारिक, उत्कंठा, भय, माता-पिता का अपने बच्चों के प्रति व्यवहार, किषोरावस्था, बाल्यावस्था, आदि घटक प्रभावित करते हैं।
शैक्षिक उपलब्धि वर्तमान सामाजिक, आर्थिक संदर्भ में सर्वोंत्तम विषिष्ट एवं महत्वपूर्ण कारक हैं। स्पष्ट रूप से शैक्षिक उपलब्धि विद्यार्थियों की सभी उपलब्धियां को प्रभावित करती हैं तथा स्वयं भी उपलब्धियों से प्रभावित होती हैं।
शैक्षिक उपलब्धि का अर्थ:-
चार्ल्स ई. स्किनर के अनुसार:-‘‘षैक्षिक कार्य प्रक्रिया का अंतिम परिणाम ही शैक्षिक उपलब्धि हैं, जो विद्यार्थियों को कार्य के बारे में अंतिम जानकारी प्रदान करता हैं।‘‘
शैक्षिक उपलब्धि विद्यार्थी द्वारा अधिगम किए गए एवं प्रयोग में लाये ज्ञान को मापने का सर्वोत्तम साधन हैं। शैक्षिक उपलब्धि के आधार पर ही हम विद्यार्थियों के मध्य अंतर कर सकते हैं। कि यह बालक प्रतिभाषाली हैं, या सामान्य हैं, या पिछड़ा हैं।
विद्यालय में विभिन्न कक्षाओं में छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि का मापन या मूल्यांकन करने के लिए कि छात्रों ने कहां तक सफलता या उपलब्धि प्राप्त की हैं। इसके लिए उपलब्धि परिक्षाऐं आयोजित की जाती हैं।
अध्ययन की आवष्यकता:-
शिक्षा वह साधन है, जिससे बालक की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शक्तियो का विकास होता हैं। षिक्षा व्यक्ति के चरित्र को उत्कृष्ट बनाती हैं। यह व्यक्ति को सभ्य बनाती हैं। षिक्षा के द्वारा व्यक्ति सही रूप में चिंतन करना सिखता है तथा षिक्षा के बिना व्यक्ति संपूर्णता को प्राप्त नहंी कर सकता।
षिक्षा प्राप्त करते-करते बालक अपने घर से कुछ आदतें भी ग्रहण करता हैं। जिससे वहां बालक अनुशासन कार्यों को समय पर पूरा करना तथा व्यवहार करना सीखता हैं। अध्ययन आदत से बालक-बालिकाओं में शैक्षिक उपलब्धि का विकास होता हैं तथा वह षिक्षा एवं शैक्षिक आदते केवल माता-पिता से ही नहीं बल्कि अपने भाई व बहनों से भी सीखता हैं। जिसका सकारात्मक प्रभाव उनकी शैक्षिक उपलब्धि पर पड़ता हैं। घर के अन्य सदस्य भी बालकों की अध्ययन आदतों को विकसित करने में सहयोग देते हैं। जबकि बालक स्वयं अध्ययन आदत का विकास करके शैक्षिक उपलब्धि ग्रहण करने की कोषिष करने में समर्थ होने की चेष्टा करते हैं। जिसके कारण बालक अपने अध्ययन आदत, शैक्षिक उपलब्धि पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
विद्यार्थी चाहे विज्ञान या कला संकाय का हो दोनों ही विद्यार्थियों में अध्ययन आदतों का निर्माण उनके परिश्रम के द्वारा ही किया जाता हैं। जिनकी शैक्षिक उपलब्धि में महत्वपूर्ण भूमिका रहती हैं। दोनों ही प्रकार के विद्यार्थियों में अपनी अध्ययन आदत विकसित की जा सकती है। जिसका प्रभाव विद्यार्थी की शैक्षिक उपलब्धि पर सकारात्मक पड़ता हैं। अतः माता-पिता, षिक्षक, अभिभावक का कर्तव्य हैं, कि वे बालकों में शैक्षिक उपलब्धि का स्तर उंचा उठाने के लिए उनमें अच्छी अध्ययन आदतों को विकास करें। अतः उक्त बातें अध्ययन की आवश्यकता को व्यक्त करता है।
संबंधित शोध साहित्य का अध्ययन:-
विभिन्न शोधकर्ताओं द्वारा जो अध्ययन किया गया हैं, उन ज्ञानकोषों की संक्षिप्त जानकारी देने का प्रयास किया गया हैं, प्रस्तुत लघुषोध प्रबंध में संबंधित साहित्य का अभाव है। जो अग्रांकित हैं -
1.1. भारत में किए गए शोध अध्ययन:-
रथ आर. (1955)‘रथ आर.‘ ने विद्यालयीन छात्रों की अध्ययन आदतों का शैक्षिक उपलब्धि पर प्रभाव का अध्ययन किया।
निष्कर्ष: छात्रों के अध्ययन आदत तथा शैक्षिक उपलब्धि में महत्वपूर्ण भूमिका पैदा करना पड़ता हैं। दोनों ही प्रकार से अध्ययन आदत तथा शैक्षिक उपलब्धि विकसित की जा सकती हैं जिसका प्रभाव बालक की शैक्षिक उपलब्धि पर सकारात्मक पड़ता हैं।
सक्सेना (1968): ‘सक्सेना‘ ने अध्ययन आदतों एवं शैक्षिक उपलब्धि में संबंध पर एक अध्ययन किया।
निष्कर्ष:अध्ययन आदतों और शैक्षिक उपलब्धि में कोई संबंध नहीं पाया गया।
पटेल के. एवं वर्स ट्रेटन (1972):‘पटेल के. एवं वर्स ट्रेटन‘ ने जेसूट स्कूल एवं महाविद्यालय के छात्रों की अध्ययन आदतों का अध्ययन किया।
निष्कर्ष: आधे से ज्यादा विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि उनकी अध्ययन आदतों के अनुरूप थी।
शाह एच. पी. (1978):‘षाह एच. पी.‘ ने एस. पी. यू. केष जिले में उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के बालकों की अध्ययन आदतों का अध्ययन किया।
निष्कर्ष: बालकों के निवास स्थान, उनके षिक्षा स्तर, उनकी उम्र तथा पारिवारिक स्थिति का प्रभाव उनकी अध्ययन आदतों पर पड़ता हैं।
कांतावाला, एन.एन.एस.पी.यू. (1980): ‘कान्तावाला‘ ने माध्यमिक शालाओं के छात्रों की अध्ययन आदतों का अध्ययन किया।
निष्कर्ष: पढ़ने की आदत श्रेणी के स्तर पर आधारित हैं।अध्ययन आदत मापनी एवं शैक्षिक उपलब्धि में सार्थक संबंध, परिणाम मापनी द्वारा नहीं पहचाना गया। अध्ययन आदत और पढ़ने की आदत का धनात्मक सार्थक संबंध हैं।
जी. सी. पी. आई. ईलाहाबाद (1981): जी.सी.पी.आई.‘ ने शोधकर्ता के अध्ययन आदत एवं शैक्षिक उपलब्धि के मध्य अध्ययन किया।
निष्कर्ष: शोधकर्ता के अध्ययन आदत एवं शैक्षिक उपलब्धि के मध्य कोई संबंध नहीं पाया गया।
डॉ. एस. एल. चोपड़ा (1982): चोपड़ा‘ ने छात्रों के अध्ययन आदत का मापन करने के लिए अध्ययन आदत मापनी का विकास किया।
निष्कर्ष: उन्होंने पाया कि छात्रों की षिक्षा के अध्ययन आदतों का मापन करने के लिए अध्ययन आदत मापनी एक विष्वसनीय एवं वैध मापनी हैं।
रेड्डी वेंकटरामी : ‘वंेकट रामी‘ ने शोधकर्ता के आंतरिक मूल्यांकन के प्रति अभिवृत्ति का अध्ययन किया।
निष्कर्ष: षिक्षक, प्रषिक्षार्थियों में सामान्य रूप से आंतरिक मूल्यांकन के प्रति धनात्मक अभिवृत्ति पायी गई किन्तु दो भिन्न-भिन्न संस्थाओं के प्रषिक्षार्थियों की अभिवृत्ति में पर्याप्त भिन्नता पाई गई।
1.2. विदेशी में किए गए शोध अध्ययन:-
रिग्नीस (1955)‘रिग्नीस‘ ने अध्ययन आदतों और शैक्षिक उपलब्धि पर एक अध्ययन किया।
निष्कर्ष: इसमें उन्होंने 63 पुरूषों और 37 स्त्रियों को न्यादर्ष हेतु चयनित किया और खण्ड विष्लेषण तकनीक के द्वारा निष्कर्ष निकाला और यह पाया कि अध्ययन आदतों और शैक्षिक उपलब्धि में कोई संबंध नहीं हैं।
टटल (1956)‘टटल‘ ने कॉलेज षिक्षकों की षिक्षण अभिवृत्ति का अध्ययन किया।
निष्कर्ष:उन्होंने पाया कि 90ः षिक्षक विष्वसनीय हैं, जो अपने मूलभूत सिद्धांतों के अनुसार चलते हैं। ये षिक्षक अन्य लोगेा पर भी विष्वास रखते हैं। और अपनी छात्रों की समस्याओं के समाधान में पूर्ण योगदान देते हैं।
ओजमेन आर. एच. (1956) ‘ओजमेन‘ ने कक्षा में अध्ययन आदत परिवर्तन पर अध्ययन किया।
निष्कर्ष:उन्होंने पाया कि पाठ्य-पुस्तकें और अध्ययन सामग्री आदतों को बदलने में सहायक नहीं होती, क्यांेकि वे सामाजिक क्रियाओं के कारण बताकर उन्हें सुलझाने का प्रयास नहीं करती। कक्षा में यदि कारणों की विवेचना की जाये तो उससे छात्रों में आदते बनने में अधिक सहायता मिल सकती हैं।
थमाटो (1969)‘थमाटो‘ ने पूर्व माध्यमिक स्तर के छात्रों की स्कूली विषय संबंधित अध्ययन पर गहन अध्ययन किया।
अध्ययन का उद्देश्य:-
अध्ययन का उद्देश्य के अंतर्गत शोधकर्ता द्वारा ली गई समस्या:- ‘‘उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों की अध्ययन आदत एवं शैक्षिक उपलब्धि पर एक अध्ययन‘‘। हेतु शोधकर्त्ता ने निम्न लिखित उद्देश्यों का निर्माण किया है -
1. 11वीं कक्षा के विद्यार्थियों की अध्ययन आदत तथा शैक्षिक उपलब्धि पर एक अध्ययन करना।
2. 11वीं कक्षा के विद्यार्थियों का अध्ययन आदत तथा शैक्षिक उपलब्धि के संबंध का अध्ययन करना।
3. 11वीं कक्षा के विज्ञान संकाय के बालक एवं बालिकाओं का अध्ययन आदतों का अध्ययन करना।
4. 11वीं कक्षा के कला संकाय के बालक एवं बालिकाओं के अध्ययन आदतों का अध्ययन करना।
5. 11वीं कक्षा के विज्ञान संकाय के बालक एवं कला संकाय के बालिकाओं के अध्ययन आदतों का अध्ययन करना।
6. 11वीं कक्षा के विज्ञान संकाय के बालक एवं बालिकाओं तथा कला संकाय के बालक व बालिकाओं के अध्ययन आदत का अध्ययन करना।
7. 11वीं कक्षा के विज्ञान संकाय के बालिका तथा कला संकाय की बालिका के संबंध का अध्ययन करना।
8. 11वीं कक्षा के विज्ञान संकाय के बालक-बालिकाओं तथा कला संकाय के बालक-बालिकाओं के अध्ययन आदत का अध्ययन करना।
अध्ययन की परिकल्पना:-
प्रस्तुत समस्या के अध्ययन हेतु शोधकर्त्ता ने निम्न लिखित परिकल्पनाएँ निर्मित की है -
1. परिकल्पना भ्1. कक्षा 11वीं के विद्यार्थियों का अध्ययन आदत तथा शैक्षिक उपलब्धि के बीच सार्थक सहसंबंध पाया जायेगा।
2. परिकल्पना भ्2.कक्षा 11वीं के बालक एवं बालिकाओं के अध्ययन आदत में कोई सार्थक अंतर नहीं पाया जायेगा।
3. परिकल्पना भ्3.कक्षा 11वीं के बालक एवं बालिकाओं के अध्ययन आदत में कोई सार्थक अन्तर नहीं पाया जायेगा।
4. परिकल्पना भ्4.कक्षा 11वीं के कला संकाय के बालक एवं बालिकाओं के अध्ययन आदत में कोई सार्थक अन्तर नहीं पाया जायेगा।
5. परिकल्पना भ्5.कक्षा 11वीं के विज्ञान संकाय के बालक एवं कला संकाय के बालिकाओं के अध्ययन आदत में कोई सार्थक अन्तर नहीं पाया जायेगा।
6. परिकल्पना भ्6.कक्षा 11वीं के विज्ञान संकाय के बालक एवं बालिका तथा कला संकाय के बालक-बालिकाओं के बीच सार्थक अन्तर नहीं पाया जायेगा।
7. परिकल्पना भ्7.कक्षा 11वीं के विज्ञान संकाय की बालिका एवं कला संकाय की बालिका के बीच सार्थक अन्तर नहीं पाया जायेगा।
अध्ययन की परिसीमा:-
प्रस्तुत शोध में अध्ययन आदतों को परिसीमित किया गया हैं। प्रस्तुत समस्या के अध्ययन हेतु शोधकर्त्ता ने निम्न लिखित परिसीमाऐं निर्धारित की गई है -
1. प्रस्तुत अध्ययन हेतु रायपुर जिले का चयन किया गया हैं।
2. प्रस्तुत अध्ययन हेतु रायपुर जिले के अंतर्गत रायपुर शहर में स्थित उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों का चयन किया गया हैं।
3. प्रस्तुत अध्ययन हेतु उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के कक्षा 11वीं के छात्र-छात्राओं का चयन किया गया हैं।
4. प्रस्तुत अध्ययन हेतु विज्ञान एवं कला संकाय के छात्र-छात्राओं का चयन किया गया हैं।
5. प्रस्तुत शोध में अध्ययन आदत एवं उनकी शैक्षिक उपलब्धि पर प्रभाव का अध्ययन किया गया हैं।
6. प्रस्तुत शोध अध्ययन में 80 विद्यार्थियों का यादृच्छिक विधि से चयन किया गया हैं।
7. इस अध्ययन हेतु कक्षा 11वीं के विज्ञान तथा कला संकाय के छात्र-छात्राओं का सामुहिक रूप से चयन किया गया है।
8. इस शोध के लिए केवल डॉ. एम. मुखोपाध्याय एवं डी. एन. सनसनवाल द्वारा निर्मित ;ैभ्प्द्ध मापनी का प्रयोग किया गया हैं।
समस्या का चर:-
अनुसंधान प्रक्रम परिकल्पना की रचना के पश्चात् संबंधित घटना के कारकों के अनुभाविक अध्ययन की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिक अनुसंधान में ऐसे कारकों को ही चर की संज्ञा दी जाती है।
स्वतंत्र चर - उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थी
आश्रित चर - अध्ययन आदत एवं शैक्षिक उपलब्धि
प्रकार्यात्मक परिभाषा:-
प्रस्तुत लघुषोध में ‘‘उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों की अध्ययन आदत एवं शैक्षिक उपलब्धि पर एक अध्ययन‘‘किया गया है। षिक्षा व समस्या की परिभाषायें जो निम्नानुसार है -
ऽ विद्यार्थी:-‘‘विद्यार्थी‘‘ का अर्थ विद्या ग्रहण करने वाले हैं। प्रस्तुत शोध में उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के कक्षा 11वीं के छात्र-छात्राओं की ‘‘अध्ययन आदतों का शैक्षिक उपलब्धि‘‘ पर प्रभाव का अध्ययन किया गया हैं।
ऽ अध्ययन आदत:- अध्ययन आदत से तात्पर्य बालक की उस आदत से हैं, कि जिन्हें वह अध्ययन के समय उपयोग करता हैं। जैसे - सुबह जल्दी उठकर पढ़ना, देर रात तक पढ़ना, लेटकर पढ़ना, एक ही विषय ज्यादा पढ़ना आदि हैं।
शोध प्रविधि:- प्रस्तुत लघुशोध प्रबंध की समस्या के अध्ययन के लिए शोधकर्ता द्वारा सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया है ।
जनसंख्या:-
जनसंख्या हेतु रायपुर नगर के चार विद्यालयों को लिया गया है। जिसमें इन चार विद्यालयों में उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों की अध्ययनरत छात्र - छात्राओं का चयन किया गया है। समग्र जनसंख्या मे से 80 विद्यार्थियों को न्यादर्ष के रूप में शामिल किया गया है।
न्यादर्श:-
प्रस्तुत अध्ययन में शोधकर्ता ने स्तरीकृत यादृच्छिक न्यादर्ष विधि का प्रयोग किया हैं। शोधकर्ता ने प्रस्तुत अध्ययन में उपयुक्त इस विधि को आधार मानकर इकाईयों का चयन किया हैं। शोधकर्ता का यह दृष्टिकोण हैं, कि पर्याप्त मात्रा में न्यादर्ष इकट्ठा करना एक अच्छी तकनीक है, क्यांेकि शोध के उद्देष्यों में प्राप्त करने व तत्संबंध परिकल्पनाओं के परिक्षण हेतु यह आवश्यक हैं, कि आवष्यकतानुसार न्यादर्ष का चयन किया जाए। प्रस्तुत अध्ययन में न्यादर्ष चयन के लिए रायपुर शहर के उच्चतर माध्यमिक के विद्यालयों में पढ़ने वाले 40 विज्ञान तथा कला संकाय के 40 बालक-बालिकाओं का चयन किया गया हैं। अतः 80 विद्यार्थीयों को न्यादर्ष में शामिल किया गया है।
उपकरणरू.
प्रस्तुत लघुशोध में शोधकर्ता द्वारा ष्ष्डॉंण् मुखोपाध्यायष्ष् एवं ष्ष्डॉंण् सनसनवालष्ष् द्वारा निर्मित ष्अध्ययन आदत इनवेंटरीष् एवं मापनी का प्रयोग किया गया है।
सांख्यिकीय विश्लेषणरू.
सांख्यिकीय अनुसंधान का मूल आधार है। शोध अथवा आंकड़ों के विष्लेषण अनुसंधान का मूल आधार हैं। अनुसंधान प्रक्रम में प्राप्त अंाकड़ों के वर्गीकरण व व्यवस्थापन के पष्चात् विभिन्न सांख्यिकीय मापों की गणना की आवश्यकता पड़ती हैं। जिसमें मध्यमानए मानक विचलन एवं टी मूल्य की गणना की गई हैं तथा संबंध ज्ञात करने के लिए सहसंबंध गुणांक द्वारा सार्थकता स्तर ज्ञात किया जाता हैं। इसे प्राप्त करने के लिए निम्न सूत्रों का प्रयोग किया गया हैं।
1ण् मध्यमानरू
जहां .
ड त्र मध्यमान
त्र मध्यमान
छ त्र कुल संख्या
2ण् प्रमाणिक विचलन पुल्डरू
जहां .
ैक्¬च त्र प्रामाणिक विचलन पुल्ड
12 त्र प्रथम समूह से प्राप्त विचलनों के वर्गों का योग
22 त्र द्वितीय समूह से प्राप्त विचलनों के वर्गाें का योग
छ1 त्र प्रथम समूह के पदों की संख्या
छ2 त्र द्वितीय समूह के पदों की संख्या
निष्कर्षरू.
1ण् परिकल्पना भ्1ण्रू सारणी से स्पष्ट होता हैंए कि कक्षा 11वीं के विद्यार्थियों के अध्ययन आदत का मध्यमान 160ण्39 हैं व उनकी शैक्षिक उपलब्धि का मध्यमान 52ण्05 प्राप्त हुआ हैं। सहसंबंध गुणांक की सार्थकता ज्ञात करने के लिए स्वतंत्रता कोटि 78 के स्तंभ में सह.संबंध गुणांक का मान देखने पर 0ण्05 स्तर पर सार्थक पाया गया है। अतः यह परिकल्पना स्वीकृत होती हैं।
2ण् परिकल्पना भ्2 रू सारणी से स्पष्ट होता हैंए कि कक्षा 11वीं के विद्यार्थियों के अध्ययन आदत का मध्यमान 158ण्98 हैं व प्रमाणिक विचलन 18ण्83 हैं। कक्षा 11वी के छात्राओं की अध्ययन आदत का मध्यमान 161ण्8 व प्रमाणिक विचलन 11ण्57 प्राप्त हुआ हैं। टी.मूल्य की सार्थकता ज्ञात करने के लिए स्वतंत्रता कोटि 78 के स्तंभ में ष्टीष् मान देखने पर 0ण्05 स्तर पर सार्थक नहीं पाया गया है। अतः यह परिकल्पना अस्वीकृत होती हैं।
3ण् परिकल्पना भ्3रू सारणी से स्पष्ट होता हैंए कि कक्षा 11वीं के विज्ञान संकाय के छात्र के अध्ययन आदत का मध्यमान 154ण्85 व प्रमाणिक विचलन 14ण्36 हैं। छात्राओं की अध्ययन आदत का मध्यमान 171ण्75 व प्रामाणिक विचलन 28ण्47 प्राप्त हुआ हैं। टी.मूल्य की सार्थकता ज्ञात करने के लिए स्वतंत्रता कोटि 38 के स्तंभ में टी.मान देखने पर 0ण्05 स्तर पर सार्थक पाया गया है। अतः यह परिकल्पना अस्वीकृत होती हैं।
4ण् परिकल्पना भ्4 रू सारणी से स्पष्ट होता हैंए कि कक्षा 11वीं के कला संकाय के छात्र के अध्ययन आदत का मध्यमान 163ण्1 व प्रामाणिक विचलन 21ण्66 हैंए व छात्राओं की अध्ययन आदत का मध्यमान 152ण्85 व प्रामाणिक विचलन 25ण्11 प्राप्त हुआ हैं। टी.मूल्य की सार्थकता ज्ञात करने के लिए स्वतंत्रता कोटि.38 के स्तंभ में टी.मान देखने पर 0ण्05 स्तर पर सार्थक नहीं पाया गया। अतः यह परिकल्पना स्वीकृत होती हैं।
5ण् परिकल्पना भ्5 रू सारणी से स्पष्ट होता हैंए कि कक्षा 11वीं के विज्ञान संकाय के छात्र के अध्ययन आदत का मध्यमान 154ण्85 व प्रामाणिक विचलन 14ण्36 हैंए व छात्राओं की अध्ययन आदत का मध्यमान 163ण्1 व प्रामाणिक विचलन 12ण्55 प्राप्त हुआ हैं। टी.मूल्य की सार्थकता ज्ञात करने के लिए स्वतंत्रता कोटि. 38 के स्तंभ में टी.मान देखने पर 0ण्05 स्तर पर सार्थक नहीं पाया गया। अतः यह परिकल्पना स्वीकृत होती हैं।
6ण् परिकल्पना भ्6 रू सारणी से स्पष्ट होता हैंए कि कक्षा 11वीं के विज्ञान संकाय के छात्र.छात्रा के अध्ययन आदत का मध्यमान 162ण्8 व प्रामाणिक विचलन 23ण्91 हैंए व कला संकाय के छात्र.छात्रा की अध्ययन आदत का मध्यमान 157ण्98 व प्रामाणिक विचलन 24ण्0 प्राप्त हुआ हैं। टी.मूल्य की सार्थकता ज्ञात करने के लिए स्वतंत्रता कोटि. 78 के स्तंभ में टी.मान देखने पर 0ण्05 स्तर पर सार्थक नहीं पाया गया। अतः यह परिकल्पना स्वीकृत होती हैं।
7ण् परिकल्पना भ्7 रू सारणी से स्पष्ट होता हैंए कि कक्षा 11वीं के विज्ञान संकाय के छात्रा के अध्ययन आदत का मध्यमान 170ण्75 व प्रामाणिक विचलन 27ण्47 हैंए व कला संकाय के छात्रा की अध्ययन आदत का मध्यमान 152ण्85 व प्रामाणिक विचलन 25ण्11 प्राप्त हुआ हैं। टी.मूल्य की सार्थकता ज्ञात करने के लिए स्वतंत्रता कोटि.38 के स्तंभ में टी.मान देखने पर 0ण्05 स्तर पर सार्थक पाया गया। अतः यह परिकल्पना अस्वीकृत होती हैं।
संदर्भ ग्रंथ सूचीरू
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3ण् डॉण् माथूर एसण् एसण् रूष्ष्सामान्य मनोविज्ञानष्ष् विनोद पुस्तक मंदिरए आगरा।
4ण् डॉण् शर्मा आरण् एण् य2006द्ध रूष्ष्षिक्षा अनुसंधानष्ष् आरण् लाल बुक डीपो मेरठ।
5ण् जुमवार केण् केण् य1959द्ध रूष्ष्मनोविज्ञान अध्ययनए अध्ययन आदत एवं बौद्धिक क्षमता का तुलनात्मक अध्ययन।ष्ष्
6ण् जैन भरत कुमार य1967द्ध रूष्ष्मनोविज्ञान अध्ययनए अध्ययन आदत विद्यालयीन प्रयास।ष्ष्
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10ण् डॉण् भटनागर आरण् पीण् रूष्ष्षिक्षा अनुसंधानष्ष् लायल बुक डिपोएमेरठ।
11ण् भटनागर सुरेष य1986द्ध रूष्ष्षिक्षा के मनोवैज्ञानिक आधारष्ष् इंटरनेषनल पब्लिषिंग हाउसए आगरा।
12ण् डॉण् दुग्गल सत्यपाल रूष्ष्निर्देषन और परामर्षष्ष् हरियाणा साहित्यएकादमीए चंडीगढ़।
13ण् अग्रवाल रामनारायण रूष्ष्मनोविज्ञान और षिक्षा में मापन एवं मूल्यांकन।ष्ष्
14ण् भार्गव महेष रूष्ष्मनोविज्ञान एवं षिक्षा में सांख्यिकी के मूल आधार।ष्ष्
15ण् नागर एनण् केण् य1982द्ध रूष्ष्सांख्यिकीय के मूल तत्वष्ष् मीनाक्षी प्रकाषनए मेरठ।
16ण् आम एण्ड जैमिसन रूष्ष्एडोल्सेंस मेकग्रहिल बुकष्ष् ष्ष्एनसाईक्लोपीडिया ऑफ एजुकेषन।
17ण् गैरिसीन कॉल सीण् रूष्ष्साइकोलॉजी ऑफ एडोलसंेस प्रेंटिसहॉल।
18ण् स्किनर चार्ल्स ईण् रूष्ष्षिक्षा मनोविज्ञान प्रकाषन ष्ष्आत्माराम एण्ड संसए दिल्ली।
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Received on 04.09.2021 Modified on 11.11.2021 Accepted on 14.12.2021 © A&V Publication all right reserved Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(3):133-141.
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